सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

 

पापाजी की ऐसी कमी इतनी जल्दी खलेगी लगा नहीं था कभी। उनको गये मुश्किल से दो महीने हुए और अंधेरा ऐसा पसरा कि न दीवारों से सटकर रोना और जोर-जोर से अकेले में चिल्लाना शुरू हो गया है।

अरूण भैया के यहां आशा की एक किरण दिखाई दी थी। दम था। बहुत सारी उम्मीदें भी जुड़ी और लगा कि यही एक रास्ता है जिसपर आगे बढ़ा जा सकता है। एक-एक कर चीजों को बेचने का काम शुरू हुआ। वाशिंग मशीन, ड्रेसिंग टेबल, नीलकमल वाला टेबल, अंदर के दोनो आलमीरे बेच दिये गए। घर करीब-करीब खाली हो गया। मकान मालिक और ऑफिस को एक महीने का नोटिस दे दिया गया। जब इतना हो गया तो आज 2 फरवरी को एक दर्दनाक दिन उगा। आचार्य जी से बात हुई तो उन्होंने साफ कह दिया कि ऐसे समय में कहीं जाना उचित नहीं है। अभी कर्मस्थल को नहीं छोड़ना चाहिए। उनकी सलाह ने दस मिनट के लिए मन शांत हुआ। फिर अशांति का तूफान उठा। तूफान ऐसा उठा कि लगा मैं फंस गया हूं। दीदी को बताया तो उसने भी कहा कि आचार्य जी के कहे अनुसार फिलहाल मत आओ। अब बात हुई हिम्मत से अरूण भैया को बताने की। उनको बताया तो लगा कि वह मुझे ऐसा-वैसा समझकर बात खत्म कर देंगे लेकिन उन्होंने एक ललन झा का नंबर दे दिया। उन्होंने उनकी बहुत प्रशंसा कर दी। 

ललन झा ने नाम भी नहीं पूछा। मुझे शक हुआ। फिर भी चूंकि अरूण भैया ने काफी महिमा मंडन किया था मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मैंने अपनी तरफ से ही उनको जन्म स्थान, तारीख और सबकुछ भेज दिया। उनका फिर फोन नहीं आया। बहुत देर बाद जब मैंने किया तो उन्होंने बृहस्पति का दोष और मंगल का दोष बता दिया। अब यही बाकी रह गया था। राहू और शनि की अंतर्दशा और महादशा के बाद अब ये भी दोष। उन्होंने यह भी बताया कि बृहस्पति आजीवन खराब रहेगा। मैं खिन्न हो गया। उसके बाद उन्होंने 1100 की डिमांड भी कर दी जिसके बाद उनके ऊपर से पूरा ही भरोसा हिल गया। लेकिन मेरा जो नुकसान होना था सो हो गया।

इधर मकानमालिक को बोल दिया था कि अभी तुरंत नहीं जा रहा हूं लेकिन उधर ऑफिस में नोटिस पीरियड वाली बात कह दी है। घर में वाशिंग मशीन नहीं है अब। कुल मिलाकर अंधेरा ही अंधेरा। मुझे खुद पता नहीं है कि मैं कल कहां हूं और इस महीने कहां रहने वाला हूं।




                                           न धूप चुने न छांव

संशय अच्छी चीज नहीं है. तय करना कठिन यही संशय बनाता है. यह चाहिए लेकिन वह भी, और अगर उसके बिना चाहिए तो उसकी संरचना ऐसी न होकर वैसी हो, और अगर संरचना वैसी न भी हो तो ये सब ऐसी परिस्थिति में हो और अगर वैसी परिस्थिति में न भी हो पाए तो कम से कम इसमें उसकी रजामंदी हो जाए और रजामंदी न होने की स्थिति में वह उसे उस तरह कर ले.

संशय, असमंजस, संदेह, जिज्ञासा या डर ये सब किसी प्रसंग, गाथा, कथा, सुखांत या दुखांत में निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

देर से जागा आदमी समय से तेज भागना चाहता है. भागता है. इस दौरान कई घटनाएं अस्वाभाविक भी होती हैं और कई स्वाभाविक भी. समय का बंटवारा सही से नहीं हो पाता है और विकृतियां अपनी जगह बनाने लगती है. बेचैनी बढ़ती है तो तालमेल और बिगड़ता है और समय रहते संतुलन में नहीं कर पाने के कारण संशय एक नासूर की तरह धमनियों में जम जाता है और समय-समय पर पूरी मशीनरी को झटका देता रहता है.

दिल का दौरा पड़ने की यह कोई उम्र नहीं है, फिर भी ऐसा कहीं वर्णित तो नहीं है कि इसकी कोई उम्र निर्धारित है.

समय और समय के बीच ही प्रतिस्पर्धा है. हर आदमी समय से आगे बढ़ चुका है. अंदर का समय और बाहर के समय के बीच का तादात्म्य इस कदर बिगड़ा हुआ है कि उसे वापस ठीक करना इस हद तक खतरनाक है कि उसके बारे में सोचा जाने पर ही संशय है.