शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

तपती आवाज

 

                                                     खोखला-खोखला-खोखला

मन रह रहकर उस अंधेरे की तरफ खींचता है जहां से जैसे-तैसे चमत्कारिक तरीके से मैं दस-बारह साल पहले बाहर आ गया था।

भाग्य की आदतें अब बर्दाश्त नहीं होती। ऐसा लगता है कि कुछ बहुत बुरा हो जाए और उसका असर उसपर ऐसा पड़े कि वह आजीवन अपनी उस आदतों से पार पा ले। 

सबकुछ अनिश्चित होना अलग बात है और उस अनिश्चितता की टीस में रोज जलते रहना दूसरी बात है। पैसों की जरूरत तब ज्यादा होती हो जब कर्ज का दबाव बढ़ता हुआ मालूम हो। खाली हाथ न घर अच्छा लगता है न बाहर। आशंका हमेशा घेरी हुई रहती है कि पता नहीं क्या हो जाएगा।

बिहार में रहना हो पाता अगर इतनी सारी परिस्थितियां आसपास उपस्थित नहीं हुई होती। भाग्य की मां की बातें तब और याद आती हैं जब मन एकदम उदास होता है। बड़ी दीदी से रिश्ता खत्म करके पता नहीं मैंने क्या हासिल कर लिया। जीत तो उन लोगों की ही हुई और पलरा हमेशा उनका ही भारी रहेगा क्योंकि उनके बच्चे अच्छी पढ़ाई करके अच्छी शादी करके समृद्धता से भरी जिंदगी में जा चुके। दीदी-जीजाजी बुलंदी पर टिके हैं और टिके रहेंगे। मेरे कुछ कह लेने या उनसे रिश्ता तोड़ लेने से उनका क्या ही बिगड़ गया। उल्टा मैं और अकेला हो गया। पहले ही कोई अपना नहीं लगता था, अब जो था वह भी अपना नहीं रहा।

दीदी की यह बात कि तुम जो बोले उसके बाद ही हमलोग तय किये कि अब जमीन के बारे में पापाजी को कुछ नहीं कहेंगे और इसी वजह से पापाजी को जमीन की रजिस्ट्री की बात नहीं कहे। उसी दीदी ने बाद में नीचे आकर कहा कि पापाजी को तो बता ही दिए थे। दीदी का झूठ कौन पकड़ेगा। जिसके पास रुपये हैं उसके पास आत्मविश्वास है, ताकत है, हिम्मत है, अरोगेंस है, पक्ष है, दलीलें है और दम है। मेरे पास क्या है? सच! सच क्या, सच यही कि जीजाजी ने मेरे कंधे पर रखकर पापाजी पर बंदूक चलाया और दीदी को अपनी बात से फंसाए रखा। 

कितना अफसोस और तनाव के बीच फंसा मैं!

क्रेडिट कार्ड में पांच हजार का ब्याज जुड़ गया। एक लाख से ज्यादा का बिल है। पता नहीं कौन सा दिन देखना बाकी रह गया है जो ऐसी परिस्थितियां एक के बाद एक आए जा रही है। दीदी ने कहा था कि कुश की शादी में आना टिकट का खर्चा मैं दे दूंगी। मैंने कहा था रहने देना। मांगना ठीक नहीं लगा मुझे। शादी हुई मैं वहां रहा। शादी के बाद मैं दो बार उसके यहां गया लेकिन रुपये की कोई बात उसने नहीं की। मैं बेमतलब शादी के लिए फ्लाईट का टिकट लिया, छुट्टी करके अपनी सैलरी कटाई सो अलग लेकिन हुआ क्या कुछ भी नहीं! दीदी ने कोई न कोई तो कहानी गढी ही होगी अपने किये को सही करने के लिए। अपने हर किये को सही करार देने के लिए दीदी को कहानियां गढने का अनुभव हो चला है।

छठ में सास-ससुर को नहीं बुलाकर छोटी से जीजाजी ने पूछा था कि वे नहीं आए। इतना कमीनापन करके भी वह अपनी राजसी जिंदगी जी रहे हैं क्योंकि उनके हाथ की रेखाओं में बुलंदी है। भैया बेचारे जैसे-तैसे कर्ज पे कर्ज लेकर जहां तक हुआ पापाजी का काम करवा पाए। जीजाजी वहां भी अपनी गर्मी दिखाते रहे, चूके नहीं कहीं भी। न तो श्मशान में न क्रिया-कर्म में। बेचारे भैया, हाथ की कमजोर लकीरों के सहारे जीते रहे, सबकुछ करते रहे, कभी-कभी चिल्लाते भी रहे लेकिन कर कुछ नहीं कर पाये। करना जो था वह बस जीजाजी कर पाए क्योंकि उनके सितारे बुलंद रहे।

पिछले दिनों कपिल के साथ नागपुर जाना हुआ। मैं, राजीव, कपिल और ड्राइवर खाने बैठे। सबने थाली ऑर्डर की लेकिन मैंने आलू पराठा मंगवाया। कपिल ने राजीव से कहा कि योगेश फूडी है, जबकि वह बस दो रोटी सब्जी में संतुष्ठ हो जाता है। मैंने मन ही मन सोचा कि उसे खाने के लिए चार सौ मिलते हैं ऑफिस से जबकि मुझे आठ सौ। अगर उसे भी आठ सौ मिलते तो शायद वह भी कभी-कभी शौक पूरी करने की सोचता। हालांकि मैंने कुछ कहा नहीं क्योंकि उसे बुरा लग जाता और फिर शायद वह मेरे साथ कभी खाने के लिए नहीं बैठता। 

अचानक मुझे सालो पहले की वह घटना याद आ गई जब पापाजी और जीजाजी के साथ हमलोग कहीं खाने गये थे। वहां घेवर पापाजी ने नहीं खाया। थोड़ी देर में जब हमलोग बाहर आये तो देखा कि पापाजी बाहर कहीं वह खा रहे थे। लगा कि पापाजी जीजाजी और हमलोग के साथ मना कर गये लेकिन थोड़ी दूर के दूसरे दुकान में खाते पकड़े गये। वह गुत्थी अबतक नहीं सुलझी थी लेकिन कपिल के साथ नागपुर दौरे में हुई इस घटना के बाद वह गुत्थी सुलझ गई. शायद पापाजी जीजाजी के रुपयों से नहीं खाना चाहते होंगे या फिर जीजाजी का रुपयों का रौब दिखाना उन्हें रास नहीं आया होगा।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

 

पापाजी की ऐसी कमी इतनी जल्दी खलेगी लगा नहीं था कभी। उनको गये मुश्किल से दो महीने हुए और अंधेरा ऐसा पसरा कि न दीवारों से सटकर रोना और जोर-जोर से अकेले में चिल्लाना शुरू हो गया है।

अरूण भैया के यहां आशा की एक किरण दिखाई दी थी। दम था। बहुत सारी उम्मीदें भी जुड़ी और लगा कि यही एक रास्ता है जिसपर आगे बढ़ा जा सकता है। एक-एक कर चीजों को बेचने का काम शुरू हुआ। वाशिंग मशीन, ड्रेसिंग टेबल, नीलकमल वाला टेबल, अंदर के दोनो आलमीरे बेच दिये गए। घर करीब-करीब खाली हो गया। मकान मालिक और ऑफिस को एक महीने का नोटिस दे दिया गया। जब इतना हो गया तो आज 2 फरवरी को एक दर्दनाक दिन उगा। आचार्य जी से बात हुई तो उन्होंने साफ कह दिया कि ऐसे समय में कहीं जाना उचित नहीं है। अभी कर्मस्थल को नहीं छोड़ना चाहिए। उनकी सलाह ने दस मिनट के लिए मन शांत हुआ। फिर अशांति का तूफान उठा। तूफान ऐसा उठा कि लगा मैं फंस गया हूं। दीदी को बताया तो उसने भी कहा कि आचार्य जी के कहे अनुसार फिलहाल मत आओ। अब बात हुई हिम्मत से अरूण भैया को बताने की। उनको बताया तो लगा कि वह मुझे ऐसा-वैसा समझकर बात खत्म कर देंगे लेकिन उन्होंने एक ललन झा का नंबर दे दिया। उन्होंने उनकी बहुत प्रशंसा कर दी। 

ललन झा ने नाम भी नहीं पूछा। मुझे शक हुआ। फिर भी चूंकि अरूण भैया ने काफी महिमा मंडन किया था मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मैंने अपनी तरफ से ही उनको जन्म स्थान, तारीख और सबकुछ भेज दिया। उनका फिर फोन नहीं आया। बहुत देर बाद जब मैंने किया तो उन्होंने बृहस्पति का दोष और मंगल का दोष बता दिया। अब यही बाकी रह गया था। राहू और शनि की अंतर्दशा और महादशा के बाद अब ये भी दोष। उन्होंने यह भी बताया कि बृहस्पति आजीवन खराब रहेगा। मैं खिन्न हो गया। उसके बाद उन्होंने 1100 की डिमांड भी कर दी जिसके बाद उनके ऊपर से पूरा ही भरोसा हिल गया। लेकिन मेरा जो नुकसान होना था सो हो गया।

इधर मकानमालिक को बोल दिया था कि अभी तुरंत नहीं जा रहा हूं लेकिन उधर ऑफिस में नोटिस पीरियड वाली बात कह दी है। घर में वाशिंग मशीन नहीं है अब। कुल मिलाकर अंधेरा ही अंधेरा। मुझे खुद पता नहीं है कि मैं कल कहां हूं और इस महीने कहां रहने वाला हूं।




                                           न धूप चुने न छांव

संशय अच्छी चीज नहीं है. तय करना कठिन यही संशय बनाता है. यह चाहिए लेकिन वह भी, और अगर उसके बिना चाहिए तो उसकी संरचना ऐसी न होकर वैसी हो, और अगर संरचना वैसी न भी हो तो ये सब ऐसी परिस्थिति में हो और अगर वैसी परिस्थिति में न भी हो पाए तो कम से कम इसमें उसकी रजामंदी हो जाए और रजामंदी न होने की स्थिति में वह उसे उस तरह कर ले.

संशय, असमंजस, संदेह, जिज्ञासा या डर ये सब किसी प्रसंग, गाथा, कथा, सुखांत या दुखांत में निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

देर से जागा आदमी समय से तेज भागना चाहता है. भागता है. इस दौरान कई घटनाएं अस्वाभाविक भी होती हैं और कई स्वाभाविक भी. समय का बंटवारा सही से नहीं हो पाता है और विकृतियां अपनी जगह बनाने लगती है. बेचैनी बढ़ती है तो तालमेल और बिगड़ता है और समय रहते संतुलन में नहीं कर पाने के कारण संशय एक नासूर की तरह धमनियों में जम जाता है और समय-समय पर पूरी मशीनरी को झटका देता रहता है.

दिल का दौरा पड़ने की यह कोई उम्र नहीं है, फिर भी ऐसा कहीं वर्णित तो नहीं है कि इसकी कोई उम्र निर्धारित है.

समय और समय के बीच ही प्रतिस्पर्धा है. हर आदमी समय से आगे बढ़ चुका है. अंदर का समय और बाहर के समय के बीच का तादात्म्य इस कदर बिगड़ा हुआ है कि उसे वापस ठीक करना इस हद तक खतरनाक है कि उसके बारे में सोचा जाने पर ही संशय है.