मौत आ जाए वही सही...
बाईपोलर डिसोर्डर की वजह से सुशांत सिंह राजपूत ने स्यूसाइड किया था। कल दिशा सालियान की खबर पर लाईव देते हुए सुशांत के बारे में पढ़ा तो खुद को लेकर चिंता और बढ़ गई। लगता नहीं कि बहुत ज्यादा दिन हाथ में बचा है इस जीवन में रहने कि लिए। अंधेरा बढ़ता ही जा रहा है और बढ़ता ही चला जाएगा। इतनी कठिन परीक्षा इतना लंबा चलना यूं ही तो नहीं है।
सबकुछ यहीं रह जाएगा। मेरी लेखनी, मेरी कहानी और मेरे सारे रिग्रेट्स।
जो बीत रहा है वह असहनीय से घोर असहनीय होता जा रहा है। भाग्य के पास सुनने के लिए समय नहीं है। वह सुनती भी है तो लगता नहीं है कि उसे कहकर हल्का महसूस किया। बड़ी दीदी से संबंध टूट गये। भैया को लेकर वह भाव कभी बन ही नहीं पाया और दोस्त बनाना नहीं हो पाया मेरे से। विक्रांत का मैं दोस्त हूं लेकिन मेरा दोस्त कौन है। क्यूं नहीं किसी को कोई मदद कर पा रहा हूं मैं। न बंटी की न बुआ की और न किसी और की। सबको मेरी तरह ही किसी की जरूरत है लेकिन किसी के पास कोई नहीं है।
हर तरह हर जगह बेशुमार आदमी फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी।
भारती भावसार को उस बड़े से केबिन में उस बड़ी सरकारी कुर्सी पर बैठा देख फिर से 2 मई 2019 की वह काली शाम याद आ गई। दादर में मैंने सब्जियां ली थीं। घर पर गन्नू का छट्ठी था। खुशी का माहौल था और फिर रिजल्ट आया। भाग्य को मैंने भेजा। भाग्य ने बहुत धैर्य से बोला कि नहीं है मेरा। मैं सोच रहा था कि फिर बोले कि मैं मजाक कर रही थी। पूरे रास्ता मैं रोते आया। ट्रेन से कूदने का मन हुआ। सबकुछ बिखरा सा लगने लगा। रोते-रोते वह रात बीती और फिर उसके बाद की कई रातें बस रोते हुए और किस्मत को कोसते हुए बीती। बाद में पता चला कि मेरा नाम रिजर्व लिस्ट में रखा गया है। मुझे 60 नंबर आए थे। इतने नंबर पर भी भारती का चयन हुआ है क्योंकि वह ओबीसी है।
मैं क्या करूं। कहां जाऊं। किससे मांगू इज्जत, रुपया और ताकत। कहीं तो कुछ भी नहीं है। इसके बाद बीपीएससी में भी यही हुआ। सभी कटेगरी के लोग जो हमसे कमजोर थे चुन लिए गये। मैं फिर बाहर रह गया। कामोठे के इस कारागार में ऐसे रहना अब नहीं हो पा रहा है। पापाजी का निधन हो गया, जमीन का माामला वैसा ही फंसा है, कर्ज है कि टूट ही नहीं रहा, ईश्वर से भरोसा उठ गया है और ऐसा लगता है कि जितना समय उनकी अराधना किया वह सब व्यर्थ हो गया। डिप्रेशन इस कदर हावी है कि लगता है कभी भी जान जा सकती है।
पिछले एक महीने में दो बार ब्लड टेस्ट करवाया है और दोनों बार कॉलेस्ट्रोल जबर्दस्त बढ़ा हुआ है। लगता है कभी भी जान निकल जाएगी।
अचानक कभी किसी बात का पछतावा शुरू हो जाता है और वह फिर घर किये रहता है। किसी का फोन परेशान कर देता है। हमेशा खुद को एक हारा हुआ इंसान की तरह देखते-देखते थक गया हूं। कहां जाऊं, किससे बात करूं, किससे कहूं कि मेरी फूटी किस्मत का ईलाज मेरे जीजाजी करवाने वाले थे लेकिन उन्होंने मेरा मजाक बनाया, मेरे पापाजी का मजाक बनाया फिर भी उनका कुछ नहीं बिगड़ा।
भगवान भी बड़ों का है। छोटे के लिए नहीं है वह। उनके दर्शन के लिए, उनको मनाने के लिए, सबकुछ के लिए रुपया चाहिए। जिसके पास रुपये नहीं हैं भगवान उनसे दूर है। 2016 में मेरी शादी मुझे हमेशा एक चमत्कार की तरह लगती आई लेकिन अब लगता है कि इस एक चीज के बाद कितनी चीजें खोती चली गई। कितना अकेला होता चला गया मैं।
कभी-कभी लगता है कि जनरल कटेगरी वाले जो बच्चे या लोग खुद को आग लगा लेते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं आखिर क्या बीतता होगा उनपर जो वे ऐसे स्टेप्स लेते होंगे फिर मैं खुद को देखता हूं। यही तो है। मैंने उससे अच्छी जगह पढ़ाई की, ज्यादा पढ़ाई की, अच्छी स्किल्स है फिर भी मैं उसको रिपोर्ट कर रहा हूं। इससे अच्छा तो यही होता कि मैं प्राईवेट में कहीं कुछ बेहतर कर लेता।
जाने और कितना समय काटना है इस कारावास में। सबकुछ अंधेरे में है। काश कि कोई हाथ पकड़कर मुझे यहां से निकाल दे। काश काश काश...