शुक्रवार, 17 अप्रैल 2026

तपती आवाज

 

                                                     खोखला-खोखला-खोखला

मन रह रहकर उस अंधेरे की तरफ खींचता है जहां से जैसे-तैसे चमत्कारिक तरीके से मैं दस-बारह साल पहले बाहर आ गया था।

भाग्य की आदतें अब बर्दाश्त नहीं होती। ऐसा लगता है कि कुछ बहुत बुरा हो जाए और उसका असर उसपर ऐसा पड़े कि वह आजीवन अपनी उस आदतों से पार पा ले। 

सबकुछ अनिश्चित होना अलग बात है और उस अनिश्चितता की टीस में रोज जलते रहना दूसरी बात है। पैसों की जरूरत तब ज्यादा होती हो जब कर्ज का दबाव बढ़ता हुआ मालूम हो। खाली हाथ न घर अच्छा लगता है न बाहर। आशंका हमेशा घेरी हुई रहती है कि पता नहीं क्या हो जाएगा।

बिहार में रहना हो पाता अगर इतनी सारी परिस्थितियां आसपास उपस्थित नहीं हुई होती। भाग्य की मां की बातें तब और याद आती हैं जब मन एकदम उदास होता है। बड़ी दीदी से रिश्ता खत्म करके पता नहीं मैंने क्या हासिल कर लिया। जीत तो उन लोगों की ही हुई और पलरा हमेशा उनका ही भारी रहेगा क्योंकि उनके बच्चे अच्छी पढ़ाई करके अच्छी शादी करके समृद्धता से भरी जिंदगी में जा चुके। दीदी-जीजाजी बुलंदी पर टिके हैं और टिके रहेंगे। मेरे कुछ कह लेने या उनसे रिश्ता तोड़ लेने से उनका क्या ही बिगड़ गया। उल्टा मैं और अकेला हो गया। पहले ही कोई अपना नहीं लगता था, अब जो था वह भी अपना नहीं रहा।

दीदी की यह बात कि तुम जो बोले उसके बाद ही हमलोग तय किये कि अब जमीन के बारे में पापाजी को कुछ नहीं कहेंगे और इसी वजह से पापाजी को जमीन की रजिस्ट्री की बात नहीं कहे। उसी दीदी ने बाद में नीचे आकर कहा कि पापाजी को तो बता ही दिए थे। दीदी का झूठ कौन पकड़ेगा। जिसके पास रुपये हैं उसके पास आत्मविश्वास है, ताकत है, हिम्मत है, अरोगेंस है, पक्ष है, दलीलें है और दम है। मेरे पास क्या है? सच! सच क्या, सच यही कि जीजाजी ने मेरे कंधे पर रखकर पापाजी पर बंदूक चलाया और दीदी को अपनी बात से फंसाए रखा। 

कितना अफसोस और तनाव के बीच फंसा मैं!

क्रेडिट कार्ड में पांच हजार का ब्याज जुड़ गया। एक लाख से ज्यादा का बिल है। पता नहीं कौन सा दिन देखना बाकी रह गया है जो ऐसी परिस्थितियां एक के बाद एक आए जा रही है। दीदी ने कहा था कि कुश की शादी में आना टिकट का खर्चा मैं दे दूंगी। मैंने कहा था रहने देना। मांगना ठीक नहीं लगा मुझे। शादी हुई मैं वहां रहा। शादी के बाद मैं दो बार उसके यहां गया लेकिन रुपये की कोई बात उसने नहीं की। मैं बेमतलब शादी के लिए फ्लाईट का टिकट लिया, छुट्टी करके अपनी सैलरी कटाई सो अलग लेकिन हुआ क्या कुछ भी नहीं! दीदी ने कोई न कोई तो कहानी गढी ही होगी अपने किये को सही करने के लिए। अपने हर किये को सही करार देने के लिए दीदी को कहानियां गढने का अनुभव हो चला है।

छठ में सास-ससुर को नहीं बुलाकर छोटी से जीजाजी ने पूछा था कि वे नहीं आए। इतना कमीनापन करके भी वह अपनी राजसी जिंदगी जी रहे हैं क्योंकि उनके हाथ की रेखाओं में बुलंदी है। भैया बेचारे जैसे-तैसे कर्ज पे कर्ज लेकर जहां तक हुआ पापाजी का काम करवा पाए। जीजाजी वहां भी अपनी गर्मी दिखाते रहे, चूके नहीं कहीं भी। न तो श्मशान में न क्रिया-कर्म में। बेचारे भैया, हाथ की कमजोर लकीरों के सहारे जीते रहे, सबकुछ करते रहे, कभी-कभी चिल्लाते भी रहे लेकिन कर कुछ नहीं कर पाये। करना जो था वह बस जीजाजी कर पाए क्योंकि उनके सितारे बुलंद रहे।

पिछले दिनों कपिल के साथ नागपुर जाना हुआ। मैं, राजीव, कपिल और ड्राइवर खाने बैठे। सबने थाली ऑर्डर की लेकिन मैंने आलू पराठा मंगवाया। कपिल ने राजीव से कहा कि योगेश फूडी है, जबकि वह बस दो रोटी सब्जी में संतुष्ठ हो जाता है। मैंने मन ही मन सोचा कि उसे खाने के लिए चार सौ मिलते हैं ऑफिस से जबकि मुझे आठ सौ। अगर उसे भी आठ सौ मिलते तो शायद वह भी कभी-कभी शौक पूरी करने की सोचता। हालांकि मैंने कुछ कहा नहीं क्योंकि उसे बुरा लग जाता और फिर शायद वह मेरे साथ कभी खाने के लिए नहीं बैठता। 

अचानक मुझे सालो पहले की वह घटना याद आ गई जब पापाजी और जीजाजी के साथ हमलोग कहीं खाने गये थे। वहां घेवर पापाजी ने नहीं खाया। थोड़ी देर में जब हमलोग बाहर आये तो देखा कि पापाजी बाहर कहीं वह खा रहे थे। लगा कि पापाजी जीजाजी और हमलोग के साथ मना कर गये लेकिन थोड़ी दूर के दूसरे दुकान में खाते पकड़े गये। वह गुत्थी अबतक नहीं सुलझी थी लेकिन कपिल के साथ नागपुर दौरे में हुई इस घटना के बाद वह गुत्थी सुलझ गई. शायद पापाजी जीजाजी के रुपयों से नहीं खाना चाहते होंगे या फिर जीजाजी का रुपयों का रौब दिखाना उन्हें रास नहीं आया होगा।

सोमवार, 2 फ़रवरी 2026

 

पापाजी की ऐसी कमी इतनी जल्दी खलेगी लगा नहीं था कभी। उनको गये मुश्किल से दो महीने हुए और अंधेरा ऐसा पसरा कि न दीवारों से सटकर रोना और जोर-जोर से अकेले में चिल्लाना शुरू हो गया है।

अरूण भैया के यहां आशा की एक किरण दिखाई दी थी। दम था। बहुत सारी उम्मीदें भी जुड़ी और लगा कि यही एक रास्ता है जिसपर आगे बढ़ा जा सकता है। एक-एक कर चीजों को बेचने का काम शुरू हुआ। वाशिंग मशीन, ड्रेसिंग टेबल, नीलकमल वाला टेबल, अंदर के दोनो आलमीरे बेच दिये गए। घर करीब-करीब खाली हो गया। मकान मालिक और ऑफिस को एक महीने का नोटिस दे दिया गया। जब इतना हो गया तो आज 2 फरवरी को एक दर्दनाक दिन उगा। आचार्य जी से बात हुई तो उन्होंने साफ कह दिया कि ऐसे समय में कहीं जाना उचित नहीं है। अभी कर्मस्थल को नहीं छोड़ना चाहिए। उनकी सलाह ने दस मिनट के लिए मन शांत हुआ। फिर अशांति का तूफान उठा। तूफान ऐसा उठा कि लगा मैं फंस गया हूं। दीदी को बताया तो उसने भी कहा कि आचार्य जी के कहे अनुसार फिलहाल मत आओ। अब बात हुई हिम्मत से अरूण भैया को बताने की। उनको बताया तो लगा कि वह मुझे ऐसा-वैसा समझकर बात खत्म कर देंगे लेकिन उन्होंने एक ललन झा का नंबर दे दिया। उन्होंने उनकी बहुत प्रशंसा कर दी। 

ललन झा ने नाम भी नहीं पूछा। मुझे शक हुआ। फिर भी चूंकि अरूण भैया ने काफी महिमा मंडन किया था मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। मैंने अपनी तरफ से ही उनको जन्म स्थान, तारीख और सबकुछ भेज दिया। उनका फिर फोन नहीं आया। बहुत देर बाद जब मैंने किया तो उन्होंने बृहस्पति का दोष और मंगल का दोष बता दिया। अब यही बाकी रह गया था। राहू और शनि की अंतर्दशा और महादशा के बाद अब ये भी दोष। उन्होंने यह भी बताया कि बृहस्पति आजीवन खराब रहेगा। मैं खिन्न हो गया। उसके बाद उन्होंने 1100 की डिमांड भी कर दी जिसके बाद उनके ऊपर से पूरा ही भरोसा हिल गया। लेकिन मेरा जो नुकसान होना था सो हो गया।

इधर मकानमालिक को बोल दिया था कि अभी तुरंत नहीं जा रहा हूं लेकिन उधर ऑफिस में नोटिस पीरियड वाली बात कह दी है। घर में वाशिंग मशीन नहीं है अब। कुल मिलाकर अंधेरा ही अंधेरा। मुझे खुद पता नहीं है कि मैं कल कहां हूं और इस महीने कहां रहने वाला हूं।




                                           न धूप चुने न छांव

संशय अच्छी चीज नहीं है. तय करना कठिन यही संशय बनाता है. यह चाहिए लेकिन वह भी, और अगर उसके बिना चाहिए तो उसकी संरचना ऐसी न होकर वैसी हो, और अगर संरचना वैसी न भी हो तो ये सब ऐसी परिस्थिति में हो और अगर वैसी परिस्थिति में न भी हो पाए तो कम से कम इसमें उसकी रजामंदी हो जाए और रजामंदी न होने की स्थिति में वह उसे उस तरह कर ले.

संशय, असमंजस, संदेह, जिज्ञासा या डर ये सब किसी प्रसंग, गाथा, कथा, सुखांत या दुखांत में निर्णायक भूमिका निभाते हैं.

देर से जागा आदमी समय से तेज भागना चाहता है. भागता है. इस दौरान कई घटनाएं अस्वाभाविक भी होती हैं और कई स्वाभाविक भी. समय का बंटवारा सही से नहीं हो पाता है और विकृतियां अपनी जगह बनाने लगती है. बेचैनी बढ़ती है तो तालमेल और बिगड़ता है और समय रहते संतुलन में नहीं कर पाने के कारण संशय एक नासूर की तरह धमनियों में जम जाता है और समय-समय पर पूरी मशीनरी को झटका देता रहता है.

दिल का दौरा पड़ने की यह कोई उम्र नहीं है, फिर भी ऐसा कहीं वर्णित तो नहीं है कि इसकी कोई उम्र निर्धारित है.

समय और समय के बीच ही प्रतिस्पर्धा है. हर आदमी समय से आगे बढ़ चुका है. अंदर का समय और बाहर के समय के बीच का तादात्म्य इस कदर बिगड़ा हुआ है कि उसे वापस ठीक करना इस हद तक खतरनाक है कि उसके बारे में सोचा जाने पर ही संशय है.


सोमवार, 9 नवंबर 2015

यक्ष-युधिष्ठिर संवाद


प्रेरणा


यक्ष और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच संवाद

यक्ष और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच संवाद -महाकाव्य महाभारत में
‘यक्ष- युधिष्ठिर संवाद’
नाम से एक पर्याप्त चर्चित प्रकरण है ।
संक्षेप में उसका विवरण यूं है:
पांडवजन अपने तेरह-वर्षीय वनवास पर वनों में विचरण कर रहे थे ।
तब उन्हें एक बार प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश हुई ।
पानी का प्रबंध करने का जिम्मा प्रथमतः सहदेव को सोंपा गया ।
उसे पास में एक जलाशय दिखा जिससे पानी लेने वह वहां पहुंचा ।

जलाशय के स्वामी अदृश्य यक्ष ने आकाशवाणी के द्वारा उसे रोकते हुए पहले कुछ प्रश्नों का उत्तर देने की शर्त रखी,
जिसकी सहदेव ने अवहेलना कर दी ।

यक्ष ने उसे निर्जीव (संज्ञाशून्य?) कर दिया ।
उसके न लौट पाने पर बारी-बारी से
क्रमशः नकुल, अर्जुन एवं भीम ने
पानी लाने की जिम्मेदारी उठाई ।
वे उसी जलाशय पर पहुंचे और यक्ष की शर्तों की अवज्ञा करने के कारण सभी का वही हस्र हुआ ।
अंत में युधिष्ठिर स्वयं उस जलाशय पर पहुंचे ।
यक्ष ने उन्हें आगाह किया और अपने प्रश्नों के उत्तर देने के लिए कहा ।
युधिष्ठिर ने धैर्य दिखाया, यक्ष को संतुष्ट किया, और जल-प्राप्ति के
साथ यक्ष के वरदान से भाइयों का जीवन भी वापस पाया ।
यक्ष ने अंत में यह भी उन्हें बता दिया कि वे धर्मराज हैं और उनकी परीक्षा लेना चाहते थे ।
उस समय संपन्न यक्ष-युधिष्ठिर संवाद वस्तुतः काफी लंबा है ।
संवाद का विस्तृत वर्णन वनपर्व के अध्याय ३१२ एवं ३१३ में दिया गया है ।
यक्ष ने सवालों की झणी लगाकर युधिष्ठिर की परीक्षा ली । अनेकों प्रकार के प्रश्न उनके सामने रखे और उत्तरों से संतुष्ट हुए ।
यक्ष प्रश्न…
यक्ष – कौन हूँ मैं?
युधिष्ठिर – तुम न यह शरीर हो,
न इन्द्रियां,
न मन,
न बुद्धि।
तुम शुद्ध चेतना हो,
वह चेतना जो सर्वसाक्षी है।
यक्ष – जीवन का उद्देश्य क्या है?
युधिष्ठिर – जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।
उसे जानना ही मोक्ष है।
यक्ष – जन्म का कारण क्या है?
युधिष्ठिर – अतृप्त वासनाएं, कामनाएं और कर्मफल ये ही जन्म का कारण हैं।
यक्ष – जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है?
युधिष्ठिर – जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया वह जन्म और मरण के बन्धन से
मुक्त है।
यक्ष – वासना और जन्म का सम्बन्ध क्या है?
युधिष्ठिर – जैसी वासनाएं वैसा जन्म।
यदि वासनाएं पशु जैसी तो पशु योनि में जन्म। यदि वासनाएं मनुष्य जैसी तो मनुष्य योनि में जन्म।
यक्ष – संसार में दुःख क्यों है?
युधिष्ठिर – लालच, स्वार्थ, भय संसार के दुःख का कारण हैं।
यक्ष – तो फिर ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की?
युधिष्ठिर – ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की।
यक्ष – क्या ईश्वर है?
कौन है वह?
क्या रुप है उसका? क्या वह स्त्री है या पुरुष?
युधिष्ठिर – हे
यक्ष! कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है।
तुम हो इसलिए वह भी है उस महान कारण को ही आध्यात्म में ईश्वर कहा गया है।
वह न स्त्री है न पुरुष।
यक्ष – उसका स्वरूप क्या है?
युधिष्ठिर – वह सत्-चित्-आनन्द है, वह अनाकार ही सभी रूपों में अपने आप को स्वयं को व्यक्त करता है
यक्ष – वह अनाकार स्वयं करता क्या है?
युधिष्ठिर – वह ईश्वर संसार की रचना, पालन और संहार करता है।
यक्ष – यदि ईश्वर ने संसार की रचना की तो फिर ईश्वर की रचना किसने की?
युधिष्ठिर – वह अजन्मा अमृत और अकारण है
यक्ष – भाग्य क्या है?
युधिष्ठिर – हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है,
बुरा भी हो सकता है।
यह परिणाम ही भाग्य है।
आज का प्रयत्न कल का भाग्य है।
यक्ष – सुख और शान्ति का रहस्य क्या है?
युधिष्ठिर – सत्य, सदाचार, प्रेम और क्षमा सुख का कारण हैं।
असत्य, अनाचार, घृणा और क्रोध का त्याग शान्ति का मार्ग है।
यक्ष – चित्त पर नियंत्रण कैसे संभव है?
युधिष्ठिर – इच्छाएं, कामनाएं चित्त में उद्वेग उतपन्न करती हैं। इच्छाओं पर विजय चित्त पर विजय है।
यक्ष – सच्चा प्रेम क्या है?
युधिष्ठिर – स्वयं को सभी में देखना
सच्चा प्रेम है। स्वयं को सर्वव्याप्त देखना सच्चा प्रेम है। स्वयं को सभी के
साथ एक देखना
सच्चा प्रेम है।
यक्ष – तो फिर मनुष्य सभी से
प्रेम क्यों नहीं करता?
युधिष्ठिर – जो स्वयं को सभी में नहीं देख सकता वह सभी से प्रेम नहीं कर सकता।
यक्ष – आसक्ति क्या है?
युधिष्ठिर – प्रेम में मांग, अपेक्षा, अधिकार आसक्ति है।
यक्ष – बुद्धिमान कौन है?
युधिष्ठिर – जिसके पास विवेक है।
यक्ष – नशा क्या है?
युधिष्ठिर – आसक्ति।
यक्ष – चोर कौन है?
युधिष्ठिर – इन्द्रियों के आकर्षण,
जो इन्द्रियों को हर लेते हैं चोर हैं।
यक्ष – जागते हुए भी कौन सोया हुआ है?
युधिष्ठिर – जो आत्मा को नहीं जानता वह जागते हुए भी सोया है।
यक्ष – कमल के पत्ते में पड़े जल की तरह अस्थायी क्या है?
युधिष्ठिर – यौवन, धन और जीवन।
यक्ष – नरक क्या है?
युधिष्ठिर – इन्द्रियों की दासता नरक है।
यक्ष – मुक्ति क्या है?
युधिष्ठिर – अनासक्ति ही मुक्ति है।
यक्ष – दुर्भाग्य का कारण क्या है?
युधिष्ठिर – मद और अहंकार।
यक्ष – सौभाग्य का कारण क्या है?
युधिष्ठिर – सत्संग और सबके प्रति मैत्री भाव।
यक्ष – सारे दुःखों का नाश कौन कर सकता है?
युधिष्ठिर – जो सब छोड़ने को तैयार हो।
यक्ष – मृत्यु पर्यंत यातना कौन देता है?
युधिष्ठिर – गुप्त रूप से किया गया अपराध।
यक्ष – दिन-रात किस बात का विचार करना चाहिए?
युधिष्ठिर – सांसारिक सुखों की क्षण-भंगुरता का।
यक्ष – संसार को कौन जीतता है?
युधिष्ठिर – जिसमें सत्य और श्रद्धा है।
यक्ष – भय से
मुक्ति कैसे संभव है?
युधिष्ठिर – वैराग्य से।
यक्ष – मुक्त कौन है?
युधिष्ठिर – जो अज्ञान से परे है।
यक्ष – अज्ञान क्या है?
युधिष्ठिर – आत्मज्ञान का अभाव अज्ञान है।
यक्ष – दुःखों से मुक्त कौन है?
युधिष्ठिर – जो कभी क्रोध नहीं करता।
यक्ष – वह क्या है जो अस्तित्व में है और नहीं भी?
युधिष्ठिर – माया।
यक्ष – माया क्या है?
युधिष्ठिर – नाम और रूपधारी नाशवान जगत।
यक्ष – परम सत्य क्या है?
युधिष्ठिर – ब्रह्म।…!

बुधवार, 13 अगस्त 2014

मुंबई टू बेगूसराय






बेगूसराय तक पहुंचने में ट्रेन की ट्रेक कई बार बदली. 

सालों पहले जब मैं दिल्ली के लिए चला था तब भी ट्रेक बदलते हुए ट्रेन आनन्द बिहार टर्मिनल तक पहुंची थी. फिर वहां से ऑटो लेकर पूछते-पूछते जेएनयू कैम्पस तक पहुंचा था. ऑटो के रास्ते में ट्रेक नहीं होता, सड़क होती है. ऑटो के ड्राइवर के बस में होता है कि वह ऑटो को किधर ले जाये लेकिन लोको पाइलट के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि उसका ट्रेक कोई और चेंज करता है.
जिंदगी भी ट्रेक पर चलती है. कुछ जिंदगी सड़क पर चलती है और कुछ जिंदगी बारी-बारी से दोनों पर चलती है.

आपके घर में कोई केस चल रहा है
हां, लेकिन उससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है
ओके, पता है हमें.
सर, जब पता है तो क्यूं कुरेदते हैं
क्यूंकि यह हमारा काम है योगेश जी

2010 का वो फोन कॉल था जो इंटेलिजेन्स ब्यूरो ने किया था. कॉमनवेल्थ गेम्स में जिन्हें जवाबदेहियां दी गईं थी उनकी पूरी जानकारी सरकार के पास पहुंचनी जरूरी थी.
क्या आने वाले साल वैसे ही बीतेंगे जैसे अब तक बीतते आए हैं?
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कहां रहते हो...दिखते नहीं हो
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काफी दिनों बाद आए हो शायद
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और उसका क्या हुआ?
वो अंदर है और मैं मुंबई में हूं. एक दिन सबको जवाब मिलेगा. उस दिन तक का वेट कीजिए.
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कोई यंग विडो देखिए न अपने लिए!
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                     दम घुटा जाता है सीने में फिर भी जिंदा हैं
            तुमसे क्या हम तो जिंदगी से भी शर्मिंदा हैं
            मर ही जाते न जो यादों के सहारे होते
            वक्त करता जो वफा....
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मैं खुद की संवेदना के केन्द्र में फिर से आ गया हूं. बेगूसराय की यात्रा इलेक्ट्रिक शॉक की तरह ही होती है.
समय के साथ यह दौड़ पता नहीं कितनी दूर तक चलेगी!

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

                               आओगे जब तुम साजना....

शादी हो जाती तो कितना अच्छा होता न!! कोई बात करने के लिए मिल जाता.

कई बार ऐसा सोचता हूं कि किसी से शादी कर ली जाए लेकिन फिर चारों तरफ से कई सवालों का एक साथ हमला हो जाता है और हथियार डालकर पीछे हट जाता हूं.

सवर्ण पैदा होना एक शाप की तरह ही है. आपको "स्टेटस" चाहिए और अगर स्टेटस नहीं है तो फिर कोई ऐसा बीमा कवर चाहिए जिसमें आपकी पत्नी का लाइव कवर हो. मन के अंदर से एक आवाज यह भी आती है कि मैं भी अगर किसी बेटी का बाप होता तो वैसा ही सोचता जैसा सब लड़की का बाप सोचता है.

जीने के लिए क्या चाहिए? शरीर को जिलाए रखने के लिए जैसे खाना-पानी और हवा चाहिए वैसे ही दिल को जिलाए रखने के लिए भी तो कुछ चाहिए न!! क्या?

मेट्रो पर किसी जोड़े को देखकर अच्छा लगता है. कितना प्यारा है वो रिश्ता जिस पर हम मरते हैं....

एक आफिस से मिसाइल की तरह दूसरे आफिस में गिरता हूं और फिर लुढ़कते हुए देर रात कमरे पर जाकर बिस्तर से अपने हिस्से की नींद मांगता हूं. कई महीने हो गए नींद आए. नींद नहीं आती है अब.

ऐसा लगता है कभी कभी कि दो जीबी के मेमोरी कार्ड में ढ़ाई जीबी का डाटा डाल दिया हो और सिस्टम हेंग कर रहा हो. दिमाग का सिस्टम ऐसे ही चल रहा है. हेंग पर हेंग होता जा रहा है लेकिन फोरमेट करने के लिए वक्त ही नहीं है.

ग्यानेन्दू ने एक बार फोन पर सच ही कहा था कि कुछ महीनों में घर जाते रहने से दिमाग रिफ्रेश हो जाता है... शायद फार्मेट उसे ही कहते हैं. लेकिन घर जाना अब उतना आसान तो नहीं रहा न!!

उस जिले का वो बस स्टाप याद दिलाता है कि जिस स्टाप पर किसी दिन मैं काफी देर तक किसी के बस का इंतजार कर रहा था और उस यात्री ने मुझे एक चादर, रोटी गरम रखने के लिए एक बर्तन, एक घड़ी और कुछ और सामान दिया था.... नहीं जाना मुझे उस बस स्टाप पर!!

ट्रेन में सफर करने का जो एक्साइटमेंट तब था वो अब नहीं है. सब बेकार है. किसी से किसी तरह का जुड़ाव नहीं है अब.

फिर भी लगता है कि तुम आओगी. हो सकता है कि तुम किसी दोपहर में किसी मेट्रो स्टेशन पर मुझसे टकरा जाओ.... क्या पता तुम किसी रात मुझे फेसबुक पर मिल जाओ.... ये भी हो सकता है कि तुम कभी किसी शादी में मुझे सजी-संवरी हुई मिल जाओ... जो हो लेकिन पता नहीं मैं इस स्वप्न से बाहर नहीं आ पा रहा हूं कि तुम मिलोगी.

मंगलवार, 11 जून 2013

शब्द

फराज से उधार

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ, फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले से मरासिम1 न सही, फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ 

अब तक दिले-ख़ुशफ़हम2 को हैं तुझसे उमीदें
ये आख़िरी शम्ऐं भी बुझाने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़ते-गिरिया3 से भी महरूम
ऐ राहते-जां मुझको रुलाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दारे-मुहब्बत4 का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

माना कि मुहब्बत का छुपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ

जैसे तुम्हें आते हैं न आने के बहाने 
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ


ुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुु

कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते-जाते

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