बुधवार, 16 सितंबर 2026

जीवन और कितना


                                             मौत आ जाए वही सही...                              

बाईपोलर डिसोर्डर की वजह से सुशांत सिंह राजपूत ने स्यूसाइड किया था। कल दिशा सालियान की खबर पर लाईव देते हुए सुशांत के बारे में पढ़ा तो खुद को लेकर चिंता और बढ़ गई। लगता नहीं कि बहुत ज्यादा दिन हाथ में बचा है इस जीवन में रहने कि लिए। अंधेरा बढ़ता ही जा रहा है और बढ़ता ही चला जाएगा। इतनी कठिन परीक्षा इतना लंबा चलना यूं ही तो नहीं है।

सबकुछ यहीं रह जाएगा। मेरी लेखनी, मेरी कहानी और मेरे सारे रिग्रेट्स।

जो बीत रहा है वह असहनीय से घोर असहनीय होता जा रहा है। भाग्य के पास सुनने के लिए समय नहीं है। वह सुनती भी है तो लगता नहीं है कि उसे कहकर हल्का महसूस किया। बड़ी दीदी से संबंध टूट गये। भैया को लेकर वह भाव कभी बन ही नहीं पाया और दोस्त बनाना नहीं हो पाया मेरे से। विक्रांत का मैं दोस्त हूं लेकिन मेरा दोस्त कौन है। क्यूं नहीं किसी को कोई मदद कर पा रहा हूं मैं। न बंटी की न बुआ की और न किसी और की। सबको मेरी तरह ही किसी की जरूरत है लेकिन किसी के पास कोई नहीं है।

हर तरह हर जगह बेशुमार आदमी फिर भी तनहाईयों का शिकार आदमी।

भारती भावसार को उस बड़े से केबिन में उस बड़ी सरकारी कुर्सी पर बैठा देख फिर से 2 मई 2019 की वह काली शाम याद आ गई। दादर में मैंने सब्जियां ली थीं। घर पर गन्नू का छट्ठी था। खुशी का माहौल था और फिर रिजल्ट आया। भाग्य को मैंने भेजा। भाग्य ने बहुत धैर्य से बोला कि नहीं है मेरा। मैं सोच रहा था कि फिर बोले कि मैं मजाक कर रही थी। पूरे रास्ता मैं रोते आया। ट्रेन से कूदने का मन हुआ। सबकुछ बिखरा सा लगने लगा। रोते-रोते वह रात बीती और फिर उसके बाद की कई रातें बस रोते हुए और किस्मत को कोसते हुए बीती। बाद में पता चला कि मेरा नाम रिजर्व लिस्ट में रखा गया है। मुझे 60 नंबर आए थे। इतने नंबर पर भी भारती का चयन हुआ है क्योंकि वह ओबीसी है। 

मैं क्या करूं। कहां जाऊं। किससे मांगू इज्जत, रुपया और ताकत। कहीं तो कुछ भी नहीं है। इसके बाद बीपीएससी में भी यही हुआ। सभी कटेगरी के लोग जो हमसे कमजोर थे चुन लिए गये। मैं फिर बाहर रह गया। कामोठे के इस कारागार में ऐसे रहना अब नहीं हो पा रहा है। पापाजी का निधन हो गया, जमीन का माामला वैसा ही फंसा है, कर्ज है कि टूट ही नहीं रहा, ईश्वर से भरोसा उठ गया है और ऐसा लगता है कि जितना समय उनकी अराधना किया वह सब व्यर्थ हो गया। डिप्रेशन इस कदर हावी है कि लगता है कभी भी जान जा सकती है।

पिछले एक महीने में दो बार ब्लड टेस्ट करवाया है और दोनों बार कॉलेस्ट्रोल जबर्दस्त बढ़ा हुआ है। लगता है कभी भी जान निकल जाएगी। 

अचानक कभी किसी बात का पछतावा शुरू हो जाता है और वह फिर घर किये रहता है। किसी का फोन परेशान कर देता है। हमेशा खुद को एक हारा हुआ इंसान की तरह देखते-देखते थक गया हूं। कहां जाऊं, किससे बात करूं, किससे कहूं कि मेरी फूटी किस्मत का ईलाज मेरे जीजाजी करवाने वाले थे लेकिन उन्होंने मेरा मजाक बनाया, मेरे पापाजी का मजाक बनाया फिर भी उनका कुछ नहीं बिगड़ा।

भगवान भी बड़ों का है। छोटे के लिए नहीं है वह। उनके दर्शन के लिए, उनको मनाने के लिए, सबकुछ के लिए रुपया चाहिए। जिसके पास रुपये नहीं हैं भगवान उनसे दूर है। 2016 में मेरी शादी मुझे हमेशा एक चमत्कार की तरह लगती आई लेकिन अब लगता है कि इस एक चीज के बाद कितनी चीजें खोती चली गई। कितना अकेला होता चला गया मैं।

कभी-कभी लगता है कि जनरल कटेगरी वाले जो बच्चे या लोग खुद को आग लगा लेते हैं या आत्महत्या कर लेते हैं आखिर क्या बीतता होगा उनपर जो वे ऐसे स्टेप्स लेते होंगे फिर मैं खुद को देखता हूं। यही तो है। मैंने उससे अच्छी जगह पढ़ाई की, ज्यादा पढ़ाई की, अच्छी स्किल्स है फिर भी मैं उसको रिपोर्ट कर रहा हूं। इससे अच्छा तो यही होता कि मैं प्राईवेट में कहीं कुछ बेहतर कर लेता।

जाने और कितना समय काटना है इस कारावास में। सबकुछ अंधेरे में है। काश कि कोई हाथ पकड़कर मुझे यहां से निकाल दे। काश काश काश...


शुक्रवार, 4 सितंबर 2026

सुख के सब साथी


                                                   सुख में न कोई..

 कमजोर सब तरफ से मारा जाता है। भाग्य के पूर्णिया जाने के बाद और उससे पहले जिस ग्रह नक्षत्र के साये में मैं रहा या रह रहा हूं, उससे निजात नहीं मिल सकी। वजह रुपये की कमी थी। हरदम यह लगता है कि अगर आस्था मंदिर वाले उस ज्ञानी पंडितजी के कहन के अनुसार वह पूजा करवा ली होती तो शायद आज दिमाग उतना अशांत नहीं होता जितना है। शायद इस अंधकार से मैं बाहर आ जाता और जो घुटन असहनीय होती जा रही है वह ठीक होती जाती।

कितनी ही बातें हैं जो रह-रहकर याद आती है। पिछले महीने दार्जिलिंग से लौटकर जो बड़की दीदी के यहां गया तो उसने अपमानित किया ही, अपनी बहू से भी अपमानित करवाया। दीदी टीवी देखती रही और मैं वहां बैठा रहा। जीजाजी से मिलकर जो बात सुलह करने की मेरी इच्छा थी वह पूरी न हो सकी। मन में था कि जीजाजी से अपनी गलती मांगकर वहां से निकल लूंगा लेकिन वैसा हुआ नहीं। वहां गया तो वह मिले और फिर जो वह उपर के फ्लोर पर गये दुबारा नहीं मिले। दीदी ने कहा कि वह हाफ पैंट में ही ऑफिस निकल गये और फिर बाद में बहू ने आकर भी कहा कि पापा को निकल गये।

2023 में भाग्य की नौकर लगने के बाद से रिश्ते खराब होते चले गये। हालांकि जीजाजी का मिजाज पहले भी जाना-पहचाना था लेकिन 2023 में जब  भाग्य ने नौकरी लगने की बात जीजाजी को बताई और उन्होंने कहा कि अब हम आपको जमीन दिलवा देंगे तो मुझे बहुत ही ज्यादा गुस्सा आया। ऐसा इसलिए क्योंकि उससे पहले मैंने दीदी को कई बार कहा था जमीन का पता लगाने के लिए और उसने जीजाजी को भी कहा था लेकिन मुझे बात में पता चला कि जीजाजी इस क्रम में हमारे बताए गये जगह पर खुद ही जमीन लेने के प्रयास में लग गये। ठीक है, उनकी भी अपनी जरूरतें होंगी। यह क्षम्य है। लालच मनुष्य का स्वभाव होता है। गुस्सा तब आया जब उन्होंने भाग्य को कहा था कि अब हम आपको जमीन दिलवा देंगे। इसमें "अब" का मतलब क्या था जब मैंने बाद में दीदी से पूछा तो उसने कहा कि अब यहां जमीन देखने के लिए तुमलोग रहोगे इसलिए। दीदी को भी पता होगा शायद कि अब का यह मतलब नहीं था लेकिन जैसे-तैसे बात को मिलाना, अपनी धूर्तता को कोई वजह दे देना या फिर अपने किए के लिए कोई बहाना खोज लेना, ऐसी चीजों में दीदी धीरे-धीरे महारत हासिल कर चुकी थी।

इसका सबसे ताजा उदाहरण जमीन बेचने की जानकारी पापाजी से छिपाने और फिर उसका कारण मुझे बनाना रहा। ऐसे कई और उदाहरण रहे। दीदी एक के बाद एक झूठ भी बोलती चली गई। एक हद के बाद जब उससे अपना झूठ छिपाना हो न सका तो उसने इस बार कहा कि झूठ वही बोलना चाहिए जिससे किसी का नुकसान न हो। मैंने सोचा कि कहूं कि ये तुम कैसे समझ पाती हो कि तुम्हारे झूठ बोलने से किसी का नुकसान हुआ या नहीं लेकिन फिर मैंने कुछ नहीं कहा। दीदी बहुत आगे निकल चुकी है। समृद्ध जीवन, खुशहाल परिवार, निश्चिंत भविष्य और जीरो लाइबलिटी के बीच लंबे समय से जीते हुए अब उसे यह फर्क भी पड़ना बंद हो चुका है कि कोई उसके या उसके पति के किए-कराए से कितना विकल है, परेशान है, दुखी है।

जीजाजी ने अस्पताल में जब कहा था कि "जो कुछ नहीं करता है वह टीचर बन जाता है। यह उन्होंने कुश की सास के लिए कहा था लेकिन भाग्य भी वहीं थी और ऐसा लगने की तमाम वजहें थी कि वह उन्होंने भाग्य को नीचा दिखाने कि लिए कहा था। इससे पहले दीदी ने मेरी कार को बोलेनो कहा था एक बार। यह भी संयोग होगा ऐसा मुझे नहीं लगा। दीदी को कार की ज्यादा जानकारी नहीं रहती है। यकीनन जीजाजी ने उन्हें बलेनो कहा होगा और तब दीदी को वैसा लगा होगा। जीजाजी ने हर तरह से कोशिश की है कि कैसे हमलोग नीचा दिख सकें। वास्तविकता यही है कि पैसे के मामले में हमलोग उनके सामने कहीं नहीं ठहर पा रहे हैं। फिर भी हमलोग उन्हें खटकते रहे हैं।

दीदी का छोटकी दीदी के यहां उसके जन्मदिन पर जाना और मां से मिलने मेरे यहां न आना, बहुत ही गंभीर विषय था। ऐसा इसलिए क्योंकि मुन्नूजी-भाग्य-पुलिस कंप्लेंट की धमकी प्रकरण के तुरंत बाद ऐसा हुआ था। कभी मौका मिला तो बड़की दीदी को यह सही से याद दिला जिया जाएगा कि भाग्य को घर संभालने भी आता है और खुद तो संभालना भी आता है। 

बहरहाल, बात मेरे मानसिक अवस्था की है जो बहुत ही खतरनाक स्तर पर चोटिल हो चुकी है। मैंने अपने हाथों से घर में सुविधाओं की सारी चीजें एक-एक कर बेच दी इसी साल मार्च में यह सोचकर कि मैं अब स्थायी रूप से मुंबई छोड़ दूंगा लेकिन ऐसा हो न सका। मैं वहां से मुंबई आया और अपने ही खाली घर में वापस मई से रहने लगा। क्या बीता मेरे मन पर यह मैं कभी किसी को कैसे बता पाऊंगा। अपनी खुशी को अपने ही हाथों त्याग कर कैसा ठगा से महसूस कर रहा हूं आज मैं कामोठे में। मुझे यहां कंप्यूटर की जरूरत है लेकिन कंप्यूटर मैंने खरीदा जाकर पूर्णिया में और यहां मैं खाली हो गया। यानि कि जो मुझे यहां खरीदना था वह मैंने पूर्णिया में खरीदा और जो मुझे यहां चाहिए था वह मैंने यहां से बेच भी दिया। आचार्य जी ने राहु के प्रभावशाली होने की बात कही थी। हरदम लगता है कि काश मैं 2023 में वह पूजा करवा लिया होता। जीजाजी से कहा था मैंने उस पूजा के लिए दीदी के कहने पर और उन्होंने कहा था कि पापाजी से मांग कर दें क्या पैसा। इससे घटिया कटाक्ष और इससे ज्यादा घटियापन क्या हो सकता था उस वक्त मेंरे लिए। मेरा समय पत्नी और बच्चों से दूर यहां इस मुंबई शहर में ऐसे बीत रहा है जैसे मैं कोई सजा काट रहा हूं।

दीदी-जीजाजी सपरिवार आनंद में हैं। शायद हंस रहे होंगे मेरी स्थिति पर। क्या समय कभी पलटेगा?