सोमवार, 9 नवंबर 2015

यक्ष-युधिष्ठिर संवाद


प्रेरणा


यक्ष और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच संवाद

यक्ष और धर्मराज युधिष्ठिर के बीच संवाद -महाकाव्य महाभारत में
‘यक्ष- युधिष्ठिर संवाद’
नाम से एक पर्याप्त चर्चित प्रकरण है ।
संक्षेप में उसका विवरण यूं है:
पांडवजन अपने तेरह-वर्षीय वनवास पर वनों में विचरण कर रहे थे ।
तब उन्हें एक बार प्यास बुझाने के लिए पानी की तलाश हुई ।
पानी का प्रबंध करने का जिम्मा प्रथमतः सहदेव को सोंपा गया ।
उसे पास में एक जलाशय दिखा जिससे पानी लेने वह वहां पहुंचा ।

जलाशय के स्वामी अदृश्य यक्ष ने आकाशवाणी के द्वारा उसे रोकते हुए पहले कुछ प्रश्नों का उत्तर देने की शर्त रखी,
जिसकी सहदेव ने अवहेलना कर दी ।

यक्ष ने उसे निर्जीव (संज्ञाशून्य?) कर दिया ।
उसके न लौट पाने पर बारी-बारी से
क्रमशः नकुल, अर्जुन एवं भीम ने
पानी लाने की जिम्मेदारी उठाई ।
वे उसी जलाशय पर पहुंचे और यक्ष की शर्तों की अवज्ञा करने के कारण सभी का वही हस्र हुआ ।
अंत में युधिष्ठिर स्वयं उस जलाशय पर पहुंचे ।
यक्ष ने उन्हें आगाह किया और अपने प्रश्नों के उत्तर देने के लिए कहा ।
युधिष्ठिर ने धैर्य दिखाया, यक्ष को संतुष्ट किया, और जल-प्राप्ति के
साथ यक्ष के वरदान से भाइयों का जीवन भी वापस पाया ।
यक्ष ने अंत में यह भी उन्हें बता दिया कि वे धर्मराज हैं और उनकी परीक्षा लेना चाहते थे ।
उस समय संपन्न यक्ष-युधिष्ठिर संवाद वस्तुतः काफी लंबा है ।
संवाद का विस्तृत वर्णन वनपर्व के अध्याय ३१२ एवं ३१३ में दिया गया है ।
यक्ष ने सवालों की झणी लगाकर युधिष्ठिर की परीक्षा ली । अनेकों प्रकार के प्रश्न उनके सामने रखे और उत्तरों से संतुष्ट हुए ।
यक्ष प्रश्न…
यक्ष – कौन हूँ मैं?
युधिष्ठिर – तुम न यह शरीर हो,
न इन्द्रियां,
न मन,
न बुद्धि।
तुम शुद्ध चेतना हो,
वह चेतना जो सर्वसाक्षी है।
यक्ष – जीवन का उद्देश्य क्या है?
युधिष्ठिर – जीवन का उद्देश्य उसी चेतना को जानना है जो जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त है।
उसे जानना ही मोक्ष है।
यक्ष – जन्म का कारण क्या है?
युधिष्ठिर – अतृप्त वासनाएं, कामनाएं और कर्मफल ये ही जन्म का कारण हैं।
यक्ष – जन्म और मरण के बन्धन से मुक्त कौन है?
युधिष्ठिर – जिसने स्वयं को, उस आत्मा को जान लिया वह जन्म और मरण के बन्धन से
मुक्त है।
यक्ष – वासना और जन्म का सम्बन्ध क्या है?
युधिष्ठिर – जैसी वासनाएं वैसा जन्म।
यदि वासनाएं पशु जैसी तो पशु योनि में जन्म। यदि वासनाएं मनुष्य जैसी तो मनुष्य योनि में जन्म।
यक्ष – संसार में दुःख क्यों है?
युधिष्ठिर – लालच, स्वार्थ, भय संसार के दुःख का कारण हैं।
यक्ष – तो फिर ईश्वर ने दुःख की रचना क्यों की?
युधिष्ठिर – ईश्वर ने संसार की रचना की और मनुष्य ने अपने विचार और कर्मों से दुःख और सुख की रचना की।
यक्ष – क्या ईश्वर है?
कौन है वह?
क्या रुप है उसका? क्या वह स्त्री है या पुरुष?
युधिष्ठिर – हे
यक्ष! कारण के बिना कार्य नहीं। यह संसार उस कारण के अस्तित्व का प्रमाण है।
तुम हो इसलिए वह भी है उस महान कारण को ही आध्यात्म में ईश्वर कहा गया है।
वह न स्त्री है न पुरुष।
यक्ष – उसका स्वरूप क्या है?
युधिष्ठिर – वह सत्-चित्-आनन्द है, वह अनाकार ही सभी रूपों में अपने आप को स्वयं को व्यक्त करता है
यक्ष – वह अनाकार स्वयं करता क्या है?
युधिष्ठिर – वह ईश्वर संसार की रचना, पालन और संहार करता है।
यक्ष – यदि ईश्वर ने संसार की रचना की तो फिर ईश्वर की रचना किसने की?
युधिष्ठिर – वह अजन्मा अमृत और अकारण है
यक्ष – भाग्य क्या है?
युधिष्ठिर – हर क्रिया, हर कार्य का एक परिणाम है। परिणाम अच्छा भी हो सकता है,
बुरा भी हो सकता है।
यह परिणाम ही भाग्य है।
आज का प्रयत्न कल का भाग्य है।
यक्ष – सुख और शान्ति का रहस्य क्या है?
युधिष्ठिर – सत्य, सदाचार, प्रेम और क्षमा सुख का कारण हैं।
असत्य, अनाचार, घृणा और क्रोध का त्याग शान्ति का मार्ग है।
यक्ष – चित्त पर नियंत्रण कैसे संभव है?
युधिष्ठिर – इच्छाएं, कामनाएं चित्त में उद्वेग उतपन्न करती हैं। इच्छाओं पर विजय चित्त पर विजय है।
यक्ष – सच्चा प्रेम क्या है?
युधिष्ठिर – स्वयं को सभी में देखना
सच्चा प्रेम है। स्वयं को सर्वव्याप्त देखना सच्चा प्रेम है। स्वयं को सभी के
साथ एक देखना
सच्चा प्रेम है।
यक्ष – तो फिर मनुष्य सभी से
प्रेम क्यों नहीं करता?
युधिष्ठिर – जो स्वयं को सभी में नहीं देख सकता वह सभी से प्रेम नहीं कर सकता।
यक्ष – आसक्ति क्या है?
युधिष्ठिर – प्रेम में मांग, अपेक्षा, अधिकार आसक्ति है।
यक्ष – बुद्धिमान कौन है?
युधिष्ठिर – जिसके पास विवेक है।
यक्ष – नशा क्या है?
युधिष्ठिर – आसक्ति।
यक्ष – चोर कौन है?
युधिष्ठिर – इन्द्रियों के आकर्षण,
जो इन्द्रियों को हर लेते हैं चोर हैं।
यक्ष – जागते हुए भी कौन सोया हुआ है?
युधिष्ठिर – जो आत्मा को नहीं जानता वह जागते हुए भी सोया है।
यक्ष – कमल के पत्ते में पड़े जल की तरह अस्थायी क्या है?
युधिष्ठिर – यौवन, धन और जीवन।
यक्ष – नरक क्या है?
युधिष्ठिर – इन्द्रियों की दासता नरक है।
यक्ष – मुक्ति क्या है?
युधिष्ठिर – अनासक्ति ही मुक्ति है।
यक्ष – दुर्भाग्य का कारण क्या है?
युधिष्ठिर – मद और अहंकार।
यक्ष – सौभाग्य का कारण क्या है?
युधिष्ठिर – सत्संग और सबके प्रति मैत्री भाव।
यक्ष – सारे दुःखों का नाश कौन कर सकता है?
युधिष्ठिर – जो सब छोड़ने को तैयार हो।
यक्ष – मृत्यु पर्यंत यातना कौन देता है?
युधिष्ठिर – गुप्त रूप से किया गया अपराध।
यक्ष – दिन-रात किस बात का विचार करना चाहिए?
युधिष्ठिर – सांसारिक सुखों की क्षण-भंगुरता का।
यक्ष – संसार को कौन जीतता है?
युधिष्ठिर – जिसमें सत्य और श्रद्धा है।
यक्ष – भय से
मुक्ति कैसे संभव है?
युधिष्ठिर – वैराग्य से।
यक्ष – मुक्त कौन है?
युधिष्ठिर – जो अज्ञान से परे है।
यक्ष – अज्ञान क्या है?
युधिष्ठिर – आत्मज्ञान का अभाव अज्ञान है।
यक्ष – दुःखों से मुक्त कौन है?
युधिष्ठिर – जो कभी क्रोध नहीं करता।
यक्ष – वह क्या है जो अस्तित्व में है और नहीं भी?
युधिष्ठिर – माया।
यक्ष – माया क्या है?
युधिष्ठिर – नाम और रूपधारी नाशवान जगत।
यक्ष – परम सत्य क्या है?
युधिष्ठिर – ब्रह्म।…!

बुधवार, 13 अगस्त 2014

मुंबई टू बेगूसराय






बेगूसराय तक पहुंचने में ट्रेन की ट्रेक कई बार बदली. 

सालों पहले जब मैं दिल्ली के लिए चला था तब भी ट्रेक बदलते हुए ट्रेन आनन्द बिहार टर्मिनल तक पहुंची थी. फिर वहां से ऑटो लेकर पूछते-पूछते जेएनयू कैम्पस तक पहुंचा था. ऑटो के रास्ते में ट्रेक नहीं होता, सड़क होती है. ऑटो के ड्राइवर के बस में होता है कि वह ऑटो को किधर ले जाये लेकिन लोको पाइलट के साथ ऐसा नहीं है क्योंकि उसका ट्रेक कोई और चेंज करता है.
जिंदगी भी ट्रेक पर चलती है. कुछ जिंदगी सड़क पर चलती है और कुछ जिंदगी बारी-बारी से दोनों पर चलती है.

आपके घर में कोई केस चल रहा है
हां, लेकिन उससे मेरा कोई लेना-देना नहीं है
ओके, पता है हमें.
सर, जब पता है तो क्यूं कुरेदते हैं
क्यूंकि यह हमारा काम है योगेश जी

2010 का वो फोन कॉल था जो इंटेलिजेन्स ब्यूरो ने किया था. कॉमनवेल्थ गेम्स में जिन्हें जवाबदेहियां दी गईं थी उनकी पूरी जानकारी सरकार के पास पहुंचनी जरूरी थी.
क्या आने वाले साल वैसे ही बीतेंगे जैसे अब तक बीतते आए हैं?
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कहां रहते हो...दिखते नहीं हो
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काफी दिनों बाद आए हो शायद
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और उसका क्या हुआ?
वो अंदर है और मैं मुंबई में हूं. एक दिन सबको जवाब मिलेगा. उस दिन तक का वेट कीजिए.
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कोई यंग विडो देखिए न अपने लिए!
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                     दम घुटा जाता है सीने में फिर भी जिंदा हैं
            तुमसे क्या हम तो जिंदगी से भी शर्मिंदा हैं
            मर ही जाते न जो यादों के सहारे होते
            वक्त करता जो वफा....
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मैं खुद की संवेदना के केन्द्र में फिर से आ गया हूं. बेगूसराय की यात्रा इलेक्ट्रिक शॉक की तरह ही होती है.
समय के साथ यह दौड़ पता नहीं कितनी दूर तक चलेगी!

गुरुवार, 11 जुलाई 2013

                               आओगे जब तुम साजना....

शादी हो जाती तो कितना अच्छा होता न!! कोई बात करने के लिए मिल जाता.

कई बार ऐसा सोचता हूं कि किसी से शादी कर ली जाए लेकिन फिर चारों तरफ से कई सवालों का एक साथ हमला हो जाता है और हथियार डालकर पीछे हट जाता हूं.

सवर्ण पैदा होना एक शाप की तरह ही है. आपको "स्टेटस" चाहिए और अगर स्टेटस नहीं है तो फिर कोई ऐसा बीमा कवर चाहिए जिसमें आपकी पत्नी का लाइव कवर हो. मन के अंदर से एक आवाज यह भी आती है कि मैं भी अगर किसी बेटी का बाप होता तो वैसा ही सोचता जैसा सब लड़की का बाप सोचता है.

जीने के लिए क्या चाहिए? शरीर को जिलाए रखने के लिए जैसे खाना-पानी और हवा चाहिए वैसे ही दिल को जिलाए रखने के लिए भी तो कुछ चाहिए न!! क्या?

मेट्रो पर किसी जोड़े को देखकर अच्छा लगता है. कितना प्यारा है वो रिश्ता जिस पर हम मरते हैं....

एक आफिस से मिसाइल की तरह दूसरे आफिस में गिरता हूं और फिर लुढ़कते हुए देर रात कमरे पर जाकर बिस्तर से अपने हिस्से की नींद मांगता हूं. कई महीने हो गए नींद आए. नींद नहीं आती है अब.

ऐसा लगता है कभी कभी कि दो जीबी के मेमोरी कार्ड में ढ़ाई जीबी का डाटा डाल दिया हो और सिस्टम हेंग कर रहा हो. दिमाग का सिस्टम ऐसे ही चल रहा है. हेंग पर हेंग होता जा रहा है लेकिन फोरमेट करने के लिए वक्त ही नहीं है.

ग्यानेन्दू ने एक बार फोन पर सच ही कहा था कि कुछ महीनों में घर जाते रहने से दिमाग रिफ्रेश हो जाता है... शायद फार्मेट उसे ही कहते हैं. लेकिन घर जाना अब उतना आसान तो नहीं रहा न!!

उस जिले का वो बस स्टाप याद दिलाता है कि जिस स्टाप पर किसी दिन मैं काफी देर तक किसी के बस का इंतजार कर रहा था और उस यात्री ने मुझे एक चादर, रोटी गरम रखने के लिए एक बर्तन, एक घड़ी और कुछ और सामान दिया था.... नहीं जाना मुझे उस बस स्टाप पर!!

ट्रेन में सफर करने का जो एक्साइटमेंट तब था वो अब नहीं है. सब बेकार है. किसी से किसी तरह का जुड़ाव नहीं है अब.

फिर भी लगता है कि तुम आओगी. हो सकता है कि तुम किसी दोपहर में किसी मेट्रो स्टेशन पर मुझसे टकरा जाओ.... क्या पता तुम किसी रात मुझे फेसबुक पर मिल जाओ.... ये भी हो सकता है कि तुम कभी किसी शादी में मुझे सजी-संवरी हुई मिल जाओ... जो हो लेकिन पता नहीं मैं इस स्वप्न से बाहर नहीं आ पा रहा हूं कि तुम मिलोगी.

मंगलवार, 11 जून 2013

शब्द

फराज से उधार

रंजिश ही सही, दिल ही दुखाने के लिए आ
आ, फिर से मुझे छोड़ के जाने के लिए आ

पहले से मरासिम1 न सही, फिर भी कभी तो
रस्मो-रहे-दुनिया ही निभाने के लिए आ

किस-किस को बताएँगे जुदाई का सबब हम
तू मुझसे ख़फ़ा है, तो ज़माने के लिए आ 

अब तक दिले-ख़ुशफ़हम2 को हैं तुझसे उमीदें
ये आख़िरी शम्ऐं भी बुझाने के लिए आ

इक उम्र से हूँ लज़्ज़ते-गिरिया3 से भी महरूम
ऐ राहते-जां मुझको रुलाने के लिए आ

कुछ तो मेरे पिन्दारे-मुहब्बत4 का भरम रख
तू भी तो कभी मुझको मनाने के लिए आ

माना कि मुहब्बत का छुपाना है मुहब्बत
चुपके से किसी रोज़ जताने के लिए आ

जैसे तुम्हें आते हैं न आने के बहाने 
ऐसे ही किसी रोज़ न जाने के लिए आ


ुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुुु

कितना आसाँ था तेरे हिज्र में मरना जाना
फिर भी इक उम्र लगी जान से जाते-जाते

ूूूूूूूूूूूूूूूूूूूूूूूूूूूूूू



शनिवार, 25 मई 2013

Those days

 “A Walk to Remember” is an inevitable segment of my Diary!

I firmly know, in spite of discharging my full efforts, I can’t close the eyes to those incidents, which were real, painful, watershed to some extent as well, and I was the only eye-witness of all those ups and downs. It’s solely right that I am sick of this life in which I have no sympathy for myself. Often, I think that I have been deprived of my share of Good Days by this age! I feel myself unable to portray those days in a column, may be due to my weak English(to me) or on account of busy schedule in which I don’t have time to myself, or may be due to my unstableness. Sometimes, I think the horror of those days beggar description. I had built so many castles in the air but all breathed its last by 29th of November. I am still asking to myself many questions and trying to cross-check myself all nights. I was right or wrong? If I was right and who was wrong and similarly if I was wrong who was right? I am not sure about getting the accurate or perfect answer off all my questions in my life, which I have written in my diary but what I am sure is- It could have been bitter, worse, more dangerous, more horrific and ultimately more wide if I had not been surrounded by my parents, well wishers and my Laptop as well, which allowed me to share myself with it by simply using MS Word. 


I first introduced to Nicholas Sparks in my Laptop, while I was watching “A walk to remember” without any company in midnight. My claim to myself to be strong enough exposed when my eyes brimmed with tears as Jamie Sullivan muttered Landon Carter “I’m scared of not being with you”. Jamie was suffering from an incurable disease and she was apprehensive for her life. She fallen in love with Landon Carter very deeply. She had tried all effort to save herself from fallen in love with anyone but she couldn’t be lucky enough in preventing herself.  
“I’m scared of not being with you”
“That’ll never happen”
The chit-chat echoed in my head and I reviewed this scene more than ten times just for reading the expression of both. How true they were! Their helplessness was displaying by their face.
Should I collate you to Jamie Sullivan and me to Landon Carter? I am little confused whether should I ahead or pause myself for introspection.
Let me sort out few things.
To me, we belonged to different world. My family had been “stripped” by one of the family members in April, 2004 and since then we had been facing extremely dire humiliation that can’t be answered in simple manner. Even my so called friends were mortifying me and I had nothing to defend myself. Not only me but also other family members were supposed to face the same experiences. It was exceptionally terrible and I am not able to find any accurate word to express my storm. Sometimes, I became furious but it was meaningless as It was a “hybrid ire”!
Correspondingly, you were also like me, a misfortunate girl, I realized, when I came to know about your muted dream to be a Doctor. You had been punished by God despite your innocence. Your wings were cut by your family members, who had worry about you.
By nature, I was always in favor to contribute as possible as I can to make you self-dependent. This was my only goal for you until you left me. I wanted to do it by hook or by crook. I wanted to see you in driving seat of your car and like a Boss with full confident. I had no hope from me but I had little from you because I had never performed well in any examination I participated in my life. I had been a very pathetic student on the other hand you were surrounded by scholars and toppers.
I had to manage various things simultaneously, had prepare myself to look after two children for long term, had prepare myself to erase those blots and scars, painted by that society where I lived for twenty years almost.  
We were not ready to find a way to be together. Neither of us knew the way to rescue ourselves from expected major challenges. We always hedged each other. I was not in favor of laying off my old parents anymore as they were already suffering from the deep pain, given by that man, on the other hand, you had to discharge your obligation to everyone in your family, who had sacrificed a lot for your survival. AIIMS was more than a Hospital for you! Of course, you had no choice but to return with your family. I could even been laid off from my Office and you knew it very well. It was an “extraordinary situation” for us.
In spite of everything, I believe that “era” was such a fine in so many other ways. I’ll tell you why, when we meet after completing our last journey. I am sure we will meet because we have to answer each other of various questions!




शुक्रवार, 1 मार्च 2013


All the World's a Stage

All the world's a stage,
And all the men and women merely players;
They have their exits and their entrances,
And one man in his time plays many parts,
His acts being seven ages. At first, the infant,
Mewling and puking in the nurse's arms.
Then the whining schoolboy, with his satchel
And shining morning face, creeping like snail
Unwillingly to school. And then the lover,
Sighing like furnace, with a woeful ballad
Made to his mistress' eyebrow. Then a soldier,
Full of strange oaths and bearded like the pard,
Jealous in honor, sudden and quick in quarrel,
Seeking the bubble reputation
Even in the cannon's mouth. And then the justice,
In fair round belly with good capon lined,
With eyes severe and beard of formal cut,
Full of wise saws and modern instances;
And so he plays his part. The sixth age shifts
Into the lean and slippered pantaloon,
With spectacles on nose and pouch on side;
His youthful hose, well saved, a world too wide
For his shrunk shank, and his big manly voice,
Turning again toward childish treble, pipes
And whistles in his sound. Last scene of all,
That ends this strange eventful history,
Is second childishness and mere oblivion,
Sans teeth, sans eyes, sans taste, sans everything. 

बुधवार, 20 फ़रवरी 2013